हिन्दुधर्म में महाभारत को एक पवित्र ग्रंथ मन गया है जो खुद में कई कथाओं को समेटे हुए है। वैसे तो महाभारत के बारे में अधिकतर लोग यही सोचते हैं की इस ग्रन्थ में पांडवों और कौरवों के जन्म से लेकर और उनके बिच धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में लड़े गए युद्ध का वर्णन किया गया है परन्तु ऐसा नहीं है। इसमें इनसे पहले का भी कई ऐसी कथाओं के वर्णन किया गया है जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। आज के  इस लेख में हम आपको ये बताएँगे की आखिर देवी गंगा अपने ही पुत्र को क्यों नदी में बहा देती थी।

महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार एक समय में हस्तिनापुर के राजा महाराज शांतनु हुआ करते थे। एक दिन की बात है वह रोज की तरह हस्तिनापुर के महल से शिकार करने को निकले और जब वो गंगा नदी के किनारे पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक सुंदर स्त्री नदी किनारे अकेले बैठी हुई है। फिर उन्होंने अपने सारथी से रथ रोकने को कहा और वो रथ से उतरकर  उस सुन्दर स्त्री के पास गए और उस सुंदर स्री का रूप देखकर मोहित हो गए। उन्होंने उस स्री के सामने विवाह करने का प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव सुन गंगा ने कहा, में आपसे विवाह करने के लिए तैयार हूं ,पर मेरी एक शर्त हैं। मुझे तुम्हरी हर शर्त मंजूर है। पहले शर्त तो सुन लीजिए गंगा ने हसते हुए कहा।

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तब महाराजा शांतनु ने कहा देवी अपनी शर्त बताओ। उसके बाद देवी गंगा बोली महाराज मेरी शर्त यह है की विवाह के पश्चात् आप मुझसे न तो कोई सवाल पूछेंगे और ना ही मुझे किसी काम को करने से रोकेंगे। और जिस दिन आप ऐसा करेंगे में आपको छोड़ कर चली जाउंगी। शर्त सुनाने के बाद महाराज शांतनु ने कहा हे देवी विवाह के पश्चात् ऐसा ही होगा। फिर हस्तिनापुर नरेश महाराज शांतनु और देवी गंगा का विवाह संपन्न हुआ।

देवी गंगा से विवाह के पश्चात् महाराज शांतनु बड़े ही खुश रहा करते थे। उनकी ख़ुशी और भी बढ़ गयी जब उन्हें पता चला की देवी गंगा गर्भ से है। फिर वो दिन भी आया जब एक दासी ने उन्हें यह समाचार दिया की महारानी गंगा ने एक पुत्र को जन्म दिया है। यह समाचार सुनकर महाराज शांतनु के ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। और वह वह अपने कक्ष से निकल कर देवी गंगा के कक्ष की ओर निकल पड़े। अभी वह रास्ते में ही थे की तभी दासी उन्हें बतलाया की देवी गंगा पुत्र को लेकर जंगल की ओर चली गई है। यह सुनकर शांतनु का मन व्याकुल हो उठा और वह सोचने लगे की इस समय गंगा मेरे पुत्र को लेकर कहाँ गई होगी। फिर वह देवी गंगा को खोजने निकला पड़े। खोजते खोजते जब वह गंगा नदी के तट पर पहुंचे तो उन्होंने देखा की गंगा उनके पुत्र को नदी में बहा रही है।यह देख वह देवी गंगा को रोकने आगे बढे लेकिन तभी उन्हें विवाह से पूर्व गंगा द्वारा दी गई शर्त का स्मरण हो आया जिस कारणवश वह वहीँ रुक गए और अपने आँखों के सामने अपने पुत्र को मरता हुआ देखते रहे। फिर भारी मन से वह अपने महल को लौट आये। कुछ समय बाद देवी गंगा भी हस्तिनापुर के महल में लौट आई परन्तु हस्तिनापुर नरेश का उनसे कुछ भी पूछने का साहस नहीं हुआ। उस दिन के बाद महाराज अंदर से दुखी रहने लगे। 

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फिर कुछ महीनो के बाद देवी गंगा ने शांतनु के दूसरे पुत्र को जन्म दिया और इस बार भी दासी ने उन्हें आकर बताया की महारानी फिर से अपने पुत्र को लेकर जंगल की और गई है। यह सुनकर महाराज शांतनु देवी गंगा के पीछे-पीछे कहला पड़े। गंगा नदी के तट पहुँचकर उन्होंने देखा की पहली बार की भाँती इस बार भी देवी गंगा अपने पुत्र को गंगा के जल में अर्पित कर दिया है। यह देख उनका दिल बैठ गया और मन ही मन वह सोचने लगे की कितनी क्रूरमाँ है जो पने ही पुत्र को जन्म लेते ही नदी में बहा देती है। फिर उन्होंने ने देवी गंगा से इसका कारण पूछना चाहा लेकिन इस बार भी वो अपने वचन के कारण उनसे कुछ भी ना पूछ सके।

ऐसे ही दीन गुजरते गए और वह अपने तीसरेकहते, पांचवें, छठे और सातवें पुत्र को अपनी आँखों के सामने गंगा नदी में बहता देखते रहे पर कुछ कर नही पाते। फिर जब देवी गंगा ने उनके आठवें पुत्र को जन्म दिया और वह उसे गंगा के तट पर बहाने ले गयी तो इस बार महाराज शांतनु खुद को रोक नहीं सके और इस बार उन्होंने गंगा को रोक दिया और उनसे पुछा की हे प्रिय तुम ऐसा क्यों कर रही हो। तब देवी गंगा ने महाराज शांतनु से कहा महाराज आपके सभी पुत्र जीवित हैं और सुरक्षित है। मैंने हमारे पुत्रों को मारा नहीं है बल्कि उन्हें महर्षि वशिष्ट के शाप से मुक्ति दिलाई है। यह सुनकर महाराज शांतनु हैरान हो गए और उन्होंने देवी गंगा से कहा की हे देवी तुम क्या कह रही हो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया।

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तब देवी गंगा ने उन्हें बतलाया की पूर्वकाल में वशिष्ठ ऋषि के पास कामधेनु गाय हुआ करती थी। कामधेनु एक दिव्य गाय थी। उन दिनों जिसकी चर्चा तीनो लोको में थीं। जिस कारण एक दिन आठ वसुओं ने उसे चुराने का विचार किया और फिर वो सभी ऋषि वशिष्ठ के आश्रम पहुँच गए और उनमें से एक ने कामधेनु गाय को चुरा लिया। उधर इस बात का पता जब ऋषि वशिष्ठ को चला तो वो क्रोधित हो उठे। क्रोध में उन्होंने वसुओं से कहा की गाय चुराना तो मनुष्यों का स्वाभाव माना जाता है परन्तु तुमलोगों  ने वसु होकर भी मनुष्य जैसी हरकत की है इसलिए मैं तुम्हे शाप देता हूँ की तुम सब मनुष्य योनि में जन्म लोगे।

यह सुनकर आठों वसु डर गये औेर उन्होंने वशिष्ठ ऋषि से कहा, महर्षि हमसे गलती हो गई ,हम सभी को क्षमा कर दें। उसके बाद काफी देर तक सारे वसु काफी देर तक महर्षि से विनती करते रहे तब जाकर ऋषि का मन पिघल गया और उन्होने वसुओं से कहा की मैं तो अपना दिया हुआ शाप वापस नहीं ले सकता लेकिन मैं ये वरदान देता हूँ की तुम्हारा मनुष्य रूप में जन्म होते ही तुम्हें मुक्ति मिलेगी। लेकिन तुम में से एक को अपने पापो का प्रायश्चित करने के लिए लंबे समय तक मनुष्य रूप में पृथ्वीलोक पर रहना पड़ेगा।

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उसके बाद ऋषि की बातें सुनकर वे सभी मेरे पास आये और उन्होने मुझसे विनती की की मैं उनकी माँ होना स्वीकारकरूँ और उन्हें मनुष्य के जन्म से मुक्ति दिलाये। उनकी प्रार्थना सुन कर मैं उनकी माँ बननेके लिए तैयार हो गई। और वही आठो वसु ने हमारे पुत्र के रूप में जन्म लिया जिसमे सात को मैंने मुक्ति दिला दी लेकिन ये आठवां वसु ऋषि के शाप के कारण मुक्त नहीं हो सका। इसे अपनी मुक्ति के लिए लम्बे समय तक इस मृत्यु लोक में रहना होगा। परन्तु महाराज मैं अपनी शर्त के अनुसार अब वापस जा रही हूँ और आपके इस पुत्र को भी अपने साथ ले जा रही हूँ और समय आने पर मैं आपका ये पुत्र आपको लौटा दूंगी। इतना कहकर देवी गंगा अपने उस आठवें पुत्र के साथ गंगा नदी में विलीन हो गई। उसके बाद हस्तिनापुर नरेश शांतनु अपने महल को लौट आये।

कई साल बाद जब एक दिन महाराज शांतनु गंगा किनारे घूम रहे थे उन्होंने देखा की एक युवा ने अपने तीरों से गंगा नदी के बहाव को रोक दिया है जिस कारन गंगा नदी का पानी सूखने लगा। फिर वह उस युवक के पास और उसे गंगा नदी के बहाव को दुबारा बहाल करने को कहा लेकिन उस युवक ने ऐसा करने से मन कर दिया। जिससे दोनों के बिच युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी तभी देवी गंगा प्रकट हुई और महाराज शांतनु से बोली महाराज यह आपका ही पुत्र देवव्रत है। इसने शास्र का ज्ञान शुक्राचार्य द्वारा प्राप्त किया है और अस्र शस्र श्री ज्ञान परशुराम से प्राप्त किया है। यह महाप्रतापी है। अब मैं इसे आपके हवाले कर रही हूं। औऱ गंगा वहा से चली गयी। फिर महराज अपने पुत्र के साथ हस्तिनापुर महल लौट आये और कालांतर में यही देवव्रत अपनी प्रतिज्ञा के कारण भीष्म कहलाये।

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