Hanuman

पौराणिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार बजरंग बली की माता अंजनी अपने पूर्व जन्म में इन्द्रराज के महल में अप्सरा थीं। उनका नाम पुंजिकस्थला था। उनका रूप बहुत आकर्षक और स्वभाव चंचल था। एक बार चंचलता के कारण उन्होंने तपस्या में लीन एक ऋषि के साथ अभद्र व्यवहार किया तब ऋषि ने क्रोध में पुंजिकस्थला को श्राप दिया की वो बानरी का रूप ले लेगी। ऐसा श्राप सुनकर पुंजिकस्थला को आत्मग्लानि हुई और उसने ऋषि से क्षमा मांगकर श्राप को वापस लेने के लिए विनती की तब ऋषि ने दयाभाव से कहा की तुम्हारा वानर रूप भी परमतेजस्वी होगा और तुम एक बहुत ही कीर्तिवान और यशस्वी पुत्र को जन्म दोगी। तो आइये जानते हैं की बजरंगबली यानि हनुमान जी का जन्म किस प्रकार हुआ और क्यों उनको वानर रूप मिला ?

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तपस्या में लीन ऋषि से श्राप मिलने के पश्चात एक दिन पुंजिकस्थला से इंद्र देव ने मनचाहा वरदान मांगने के लिए कहा। तब पुंजिकस्थला ने इंद्र देव से कहा कि यदि संभव हो तो वो उसे ऋषि द्वारा दिए गए श्राप से मुक्ति प्रदान करें। इंद्रदेव के पूछे जाने पर पुंजिकस्थला ने बताया कि मुझे प्रतीत हुआ कि वो ऋषि एक वानर हैं और मैंने उन ऋषि पर फल फेंकना शुरू कर दिए परन्तु वो कोई साधारण वानर नहीं अपितु परम तपस्वी साधु थे। मेरे द्वारा तपस्या भंग होने के कारण उन्होंने मुझे श्राप दिया जब भी मुझे किसी से प्रेम होगा तो मैं वानर का रूप धारण कर लूंगी। मेरा ऐसा रूप होने बाद भी उस व्यक्ति का प्रेम मेरे प्रति कम नहीं होगा। इंद्रदेव ने पूरा वृत्तांत सुनने के बाद कहा कि तुम्हे धरती पर जाकर निवास करना होगा, वहां तुम्हे एक राजकुमार से प्रेम होगा जो तुम्हारा पति बनेगा। विवाह के पश्चात तुम शिव के अवतार को जन्म दोगी और फिर तुम्हे इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी ।

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इंद्र के वचन सुनकर पुंजिकस्थला अंजनी के रूप में धरती पर निवास करने लगी। उसे वन में एक बार एक युवक दिखा जिसकी और वो आकर्षित हुई। जैसे ही उस युवक ने अंजनी को देखा अंजनी का चेहरा वानर का हो गया। अंजनी ने युवक से अपना चेहरा छुपाया। जब युवक उनके पास आया तो अंजनी ने कहा मैं बहुत बदसूरत हूँ परन्तु जब अंजनी ने उस युवक की ओर देखा तो वो भी वानर रूप में ही था। उस युवक ने बताया कि मैं वानरराज केसरी हूँ और जब चाहूँ तब मनुष्य रूप धारण कर सकता हूँ। दोनों को एक दूसरे से प्रेम हुआ और वे विवाह के बंधन में बंध गए।

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कुछ समय पश्चात जब दोनों संतान सुख से वंचित रहे तब अंजनी मातंग ऋषि के पास पहुंची और अपनी पीड़ा बताई तब मातंग ऋषि ने उन्हें नारायण पर्वत पर स्थित स्वामी तीर्थ जाकर १२ वर्ष तक उपवास करके तप करने के लिए कहा। तब एक बार वायु देव ने अंजनी की तपस्या से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम्हे अग्नि, सूर्य, सुवर्ण, वेद वेदांगों का मर्मज्ञ और बलशाली पुत्र प्राप्त होगा। यह वरदान प्राप्त होने के पश्चात वे शिव जी की तपस्या करने लगीं तब शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा तब अंजना ने ऋषि द्वारा मिले श्राप के विषय में बताते हुए कहा कि इस श्राप से मुक्त होने के लिए मुझे शिव के अवतार को जन्म देना है, इसलिए कृपया आप बालरूप में मेरे गर्भ से जन्म लें। शिव जी ने अंजनी को आशीर्वाद दिया और अंजना के गर्भ से बजरंग बलि के रूप में शिव जी ने जन्म लिया। अंजनी पुत्र होने के कारण हनुमान जी को आंजनेय भी कहा जाता है।

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