राजा नहुष को क्यों बनना पड़ा अजगर?

जैसा की हम सभी जानते हैं की स्वर्ग के राजा इंद्र हैं परन्तु अधिकतर जनमानस यह नहीं जानते की एक बार जब इंद्र की शक्ति चली गयी थी तो पृथ्वी लोक के एक वीर और प्रतापी राजा को स्वर्ग के सिंघासन पर बैठाया गया था। परन्तु स्वर्ग की गद्दी मिलने के बाद उस राजा ने कुछ ऐसा किया जिसकी वजह से उसे अजगर योनि में जन्म लेना पड़ा। तो आइये जानते हैं की मनुष्य रुपी वह राजा कौन था और उसने ऐसी क्या भूल की जिसकी वजह से उसे अजगर योनि में जन्म लेना पड़ा।

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ये कथा राजा नहुष से जुडी हुई है जिसका वर्णन धर्मग्रन्थ महाभारत के साथ साथ श्रीमद्भागवत में भी मिलता है। महाभारत ग्रन्थ के वर्णानिपर्व के आजगर उपपर्व  में वर्णित कथा के अनुसार बात उस समय की है जब पांडव दुर्योधन के हाथों जुए में अपना सबकुछ हार जाने के बाद 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास व्यतीत करने के लिए वन में भटक रहे थे। उसी दौरान एक दिन की बात है भीमसेन को बड़ी जोरों की भूख लगी। उस समय कुटिया में खाने को कुछ भी नहीं था तब भीमसेन खाने की खोज में कुटिया से बाहर निकल पड़े। भूख से व्याकुल भीमसेन पैर पटकते हुए बड़ी ही तेजी से आगे बढ़ने लगे यह देख गुफाओं में रहनेवाले सर्प इधर उधर बड़े वेग से भागने लगे जिसे देख भीमसेन को क्रोध आ गया और वे उन्ही का पीछा करने लगे। परन्तु अभी वो थोड़ी ही दूर आगे बढे थे की उन्हें  एक विशालकाय अजगर दिखा जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। भीमसेन ने देखा की वह अजगर अपने शरीर से एक विशाल पर्वत को ढक रखा है। उसका प्रत्येक अंग विचित्र चिन्हो से चिन्हित होने के कारण विचित्र दिख रहा था। उसका रंग हल्दी के समान पीला था। प्रकाशमान चारों दाढ़ों से युक्त उसका मुख गुफा-सा जान पड़ता था। आँखें उसकी ऐसी लग रही थी मानो वह अग्नि उगल रही हो। फिर कुछ देर बाद भीमसेन ने सोचा भले ही अजगर कितना भी विशाल क्यों ना हो लेकिन मुझसा बलवान नहीं हो सकता और यही सोचकर वे अजगर के पास चले गए परन्तु जैसे ही वह अजगर के पास पहुंचे उस अजगर ने भीमसेन दोनों बाहों को बलपूर्वक जकड लिया। उसके बाद कुछ देर के लिए भीमसेन अचेत हो गए। वैसे भीमसेन में दस हजार गजराज जितना बल था फिर भी सर्प को मिले हुए वरदान के प्रभाव से मोहित हो जाने के कारण वे अपना साहस खो बैठे | फिर जब कुछ देर बाद उनकी चेतना वापस लौटी तो वे धीरे-धीरे उस अजगर के पकड़ से बाहर आने की चेष्टा करने लगे परन्तु सफल न हो सके।

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यह देख भीमसेन मन ही मन उस अजगर की अत्यंत अद्भुत शक्ति के बारे में विचार करने लग गए।और फिर उन्होंने अजगर से पुछा की हे सर्पराज आप कौन हैं ? और मुझे पकड़कर क्या करेंगे ? मैं पाण्डुपुत्र भीमसेन हूँ। मुझ में दस हजार हाथियों का बल है फिर भी न जाने कैसे आपने मुझे अपने वश में कर लिया ? क्योंकि मेरे सामने सैकड़ों सिंह,व्याघ्र और गजराज के आलावा कई राक्षस,पिशाच और महाबली नाग भी AAYE परन्तु मुझे कोई भी वश में नहीं कर PAYA ? परन्तु मेरे लाख कोशिश करने के बाद आपने मुझे वश में कर रखा है। इसका क्या कारण है ? क्या आप में किसी विद्या का बल है अथवा आपको कोई अद्भुत वरदान मिला है ?  यह सुन उस अजगर ने अपने विशाल शरीर से जकड़कर भीमसेन को चारों ओर से लपेटते हुए कहा हे महाबाहु मैं दीर्घ काल से भूखा बैठा था आज सौभाग्यवश देवताओं ने तुम्हे ही मेरे लिये भोजन के रूप में भेज दिया है। सभी देह धारियों को अपने-अपने प्राण प्रिय होते हैं। परन्तु तुम्हे अपना ग्रास बनाने से पहले जो मैं तुम से कहने जा रहा हूँ उसे ध्यान से सुनो।

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मैं राजर्षि नहुष हूँ तुमने मेरा नाम अवश्य ही सुना होगा।  मैं तुम्हारे पूर्वजों का भी पूर्वज हूँ। महाराज आयु का वंश प्रवर्तक पुत्र हूँ। परन्तु अपनी एक भूल के कारण आज मैं अजगर बनकर कष्ट भोग रहा हूँ। यह सुन भीमसेन ने फिर उस अजगर से पुछा की हे भुजंग आपने ऐसी कौन सी भूल की थी जिसकी वजह से आपको अजगर योनि में जन्म लेना पड़ा। भीमसेन के मुख से ऐसी बातें सुनकर वह अजगर द्रवित हो उठा उसके आँखों से आंसू बहने लगे फिर उसने भीम सेन ने कहा हे पाण्डुपुत्र भीमसेन मैंने जो कर्म किया था उसके लिए मुझे ये सजा तो मिलनी ही थी। अब मैं तुम्हे वह बताने जा रहा हूँ जिसकी वजह से मैं अजगर बन गया।

बात उस समय की जब एक बार महर्षि दुर्वासा किसी काम से देवराज इंद्र के दरबार में पहुंचे परन्तु देवराज इंद्र ने उनका यथोचित सत्कार नहीं किया। यह देख ऋषि दुर्वाशा क्रोधित हो उठे और उन्होंने देवराज को बल हीन होने का शाप दे दिया। उधर जब यह बात दैत्यों को पता चला तो उन्होंने स्वर्ग पर आक्रमण कर  उत्पात मचाना शुरू कर दिया। यह देख इंद्र कहीं जाकर छिप गए। इस पर दैत्यों का साहस और बढ़ और रोज स्वर्ग पर अलग-अलग तरह से हमले होने लगे।

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तब स्वर्ग के अन्य सभी देवताओं ने सप्त ऋषियों की सलाह से राजा नहुष अर्थात मुझको स्वर्ग का राजा बना दिया। उस समय धरती पर मैं ही सबसे वीर और प्रतापी राजा हुआ करता था। फिर कुछ दिन मैंने दैत्यों से युद्ध किया जिसमे उनकी हार हुई। उसके बाद दैत्य शांत बैठ गए और स्वर्ग में शांति हो गई। लेकिन, स्वर्ग का राजपद और इंद्र का आसन मिलने के कुछ ही दिनों में मुझपर सत्ता और शक्ति का नशा छा गया। मैं मनमानियों पर उतर आया। और इसी मनमनी में मैंने एक दिन देवराज इंद्र की पत्नी शचि को अपने सामने पेश होने का फरमान सुना दिया। उस समय मुझे यह लग रहा था जब इंद्र का आसन और उसकी शक्तियां मेरे पास हैं, तो इंद्र की पत्नी शची मुझे अपना पति स्वीकार कर ले।

परन्तु शचि ने मना कर दिया। उसके बाद मैं उसे तरह-तरह से परेशान करने लगा। तब एक दिन मुझसे परेशान होकर शचि देवगुरु बृहस्पति के पास गईं, और उन्हें सारी बातें बताईं। उधर मेरी मनमानियों से सभी ऋषि भी परेशान थे। इसलिए देवगुरु ने शचि को एक युक्ति सुझाई। उन्होंने शचि से कहा कि वह मेरा प्रस्ताव मान ले और मुझसे कहे कि अगर वो सप्त ऋषियों को कहार बनाकर खुद उनकी डोली में बैठकर आए तो वह मुझे अपना पति स्वीकार कर LEGI शचि ने ये सुझाव मान लिया। उसने मुझ तक अपनी इस शर्त का संदेश भिजवा दिया।

इधर शचि का संदेश पाकर मैं खुश हो गया और मैंने  सप्तऋषियों को डोली उठाने का आदेश दिया। मजबूरी में ऋषियों को मेरी बात माननी पड़ी लेकिन वृद्ध होने के कारण वे तेज नहीं चल पा रहे थे। तो मैंने डोली उठाकर आगे चल रहे अगस्त ऋषि को लात मारते हुए तेज चलने को कहा। इस पर ऋषियों के सब्र का बांध टूट गया। फिर उन्होंने मुझे डोली से गिराते हुए तुरंत अजगर बन जाने का शाप दे दिया। उसके बाद धरती पर गिरा मैं अजगर बन गया और अपने किए पर PACHATANE लगा। फिर जब मैं इंद्र के सिंहासन से भ्रष्ट हो शीघ्रतापूर्वक श्रेष्ट विमान से निचे गिरने लगA उस समय मैंने मुनिश्रेष्ठ भगवान अगस्त्य से प्रार्थना की कि प्रभो ! मेरे शाप का अंत नियत कर दीजिए।

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उस समय उन तेजस्वी महर्षिने दया से द्रवित होकर  मुझसे कहा-‘राजन् ! कुछ काल के पश्चात् तुम इस शाप से मुक्त हो जाओगे। इसके आलावा महर्षि ने मुझसे कहा था कि जो  तुम्हारे पूछे हुए प्रश्नो का विभागपूर्वक उत्तर दे दे, वही तुम्हें शापसे छुड़ा सकता है। राजन् ! जिसे तुम पकड़ लोगे वह बलवान -से-बलवान् प्राणी क्यों न हो, उसका भी धैर्य छूट जायगा । एवं तुमसे अधिक शक्तिशाली पुरुष क्यों न हो, सबका साहस शीघ्र ही खो जायगा। तत्पश्चात् वे सारे महर्षि अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार में अत्यन्त दुष्कर्मी होने के कारण इस अपवित्र नरकमें निवास करता हूँ। यह SUN महाबाहु भीम ने उस अजगर से कहा HE महासर्प । न तो मैं आप पर क्रोध करता हूँ और न अपनी ही निन्दा करता हूँ। और जहाँ तक आपके के प्रश्नो के उत्तर देने की बात है तो वह मेरे ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर ही दे सकते हैं और तभी आपको इस योनि से मुक्ति मिल सकती है। यह सुन उस अजगर ने भीमसेन को छोड़ने का निश्चय किया और फिर युधिष्ठिर उस अजगर के पास आये और उसके प्रश्नो का सही सही उत्तर दिया लेकिन अजगर रुपी राजा नहुष ने युधिष्ठिर से कौन कौन से प्रश्न पूछे और युधिष्ठिर ने उन प्रश्नो के क्या उत्तर दिए ये फिर कभी।