मित्रों आप सभी ने परशुराम जी के बारे में तो जानते ही होंगे जिनहे भगवान विष्णु का अंशावतार भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है की भगवान परशुराम का जन्म देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप रेणुका के गर्भ से हुआ था। इनके पिता का नाम महर्षि जमदग्नि था। ऐसा माना जाता है की परशुराम जी के बचपन का नाम राम था परन्तु जब भगवान शिव ने उन्हें परशु नामका अस्त्र वरदान स्वरुप दिया उसके बाद उसनका नाम परशुराम हो गया। आज के इस लेख में हम आपको भगवान परशुराम ने क्यों पृथ्वी से इक्कीस बार क्षत्रियों का विनाश किया था ?  

महाभारत के अनुगीतापर्व में वर्णित कथा के अनुसार महाभारत काल में कार्तवीर्य अर्जुन नाम का एक प्रसिद्ध  राजा हुआ करता था। जिसकी एक हजार भुजाएं थी। कार्त्तवीर्य अर्जुन ने घोर तप द्वारा भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाएँ प्राप्त की थी। उसके बाद उसे सहस्त्रार्जुन के नाम से जाना जाने लगा। भगवान दत्तात्रेय से हजार भुजाओं का वरदान मिलने के बाद कार्तवीर्य अर्जुन ने केवल धानुष बाण की सहायता से सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने अधिकार में कर लिया।

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एक दिन की बात है राजा कार्तवीर्य शिकार करने के उद्देश्य से समुद्र के किनारे पहुंचा परन्तु वहां पहुँच कर उसने अपने बल के घमंड में आकर सैकड़ों बाणो की वर्षा समुद्र पर करने लगा जिसकी वजह से समुद्र के प्राणी लहूलुहान होकर मृत्यु को प्राप्त करने लगे। यह देख समुद्र से रहा नहीं गया और वह प्रकट होकर उसके आगे मस्तक झुकाया और हाथ जोड़ते हुए बोला हे राजन मुझपर बाणों की वर्षा क्यों कर रहे हो ?तुम्हारे बाणो से मेरे अंदर रहनेवाले प्राणियों की हत्या हो रही है। बोलो तुम्हारी किस आज्ञा का पालन करूँ। कृपया मुझपर बाण चलाना बंद करो।

समुद्र की बाते सुनकर कार्तवीर्य अर्जुन बोला- हे समुद्र मैं तुझपर तभी बाण चलाना बंद करूँगा जब तुम मुझे ये बताओगे की इस पृथ्वी पर कौन सा ऐसा धनुर्धर है जो युद्ध में मेरा मुकाबला कर सकता है और वह वीर कहाँ रहता है। तब समुद्र ने कहा राजन ! यदि तुमने महर्षि जमदग्नि का नाम सुना हो तो उन्ही के आश्रम पर चले जाओ। उनके पुत्र परुशराम जी ही ऐसे  वीर धनुर्धर हैं जो तुम्हारे युद्ध की चुनौती स्वीकार कर सकते हैं और तुम्हारा अच्छी तरह सत्कार भी कर सकते हैं।

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समुद्र की मुख से परशुराम जी की वीरता का बखान सुनकर कार्तीवीर्य अर्जुन क्रोध से लाल हो गया और बोला हे समुद्र अभी तो मैं जा रहा हूँ परन्तु अगर तुम्हारी बात मिथ्या साबित हुई तो वापस आकर तुम्हारा समूल नाश कर दूंगा। इतना कहकर राजा कार्तवीर्य महर्षि जमदग्नि के आश्रम के लिए निकला पड़ा। वहां पहुंचकर उसने परशुराम जी सहित उनके पिता और भाई बंधुओं को भला-बुरा कहने लगा। कार्तवीर्य की मुख से ऐसे दुवचन सुनकर भगवान परशुराम को क्रोध आ गया उन्होंने आगे बढकर उससे पुछा दुष्ट तुम कौन हो और मेरे पिता एवं भाई बंधुओं ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो तुम उन्हें अपमानित कर रहे हो। तब कार्तवीर्य ने कहा मैं राजा कार्तवीर्य अर्जुन हूँ लोग मुझे सहस्त्रार्जुन भी कहते हैं। मैं यहाँ तुमसे युद्ध करने आया हूँ। अगर तुझमे हिम्मत हो तो इसी समय मुझसे युद्ध करो।

युद्ध की ललकार सुन शत्रु सेना को भस्म करनेवाले अमित तेजस्वी परशुरामजी का तेज प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने अपना फरसा उठाया और और सहस्त्रार्जुन से युद्ध करने लगे। दोनों में काफी समय तक भयंकर युद्ध हुआ और अंत में परशुराम जी ने हजार भुजाओं वाले उस राजा की सभी भुजाएं वृक्ष की भांति सहसा काट डाले। सभी भुजाएं कट जाने के कारण कार्तवीर्य अर्जुन जमीन पर गिर गया और परलोक सिधार गया।

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उधर इस बात की सूचना जब राजा कार्तवीर्य अर्जुन के बंधू-बांधव के पास पहुंची तो वे सभी शास्त्र धारण कर परशुराम जी के आश्रम में एकत्र हो गए तथा हाथों में तलवार और शक्तियां लेकर परशुराम जी पर चारों ओर से टुट पड़े। और देखते ही देखते सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम के पिता जमदग्नि को मार डाला।  यह देख परशुराम जी धनुष लेकर तुरंत रथ पर सवार हो गए और बाणों की वर्षा करते हुए राजा की सेना का संहार करने लगे।उसके बाद बहुत से क्षत्रिय परशुराम जी के भय से पीड़ित हो सिंह के सताए हुए मृगों की भांति पर्वतों की गुफा में छिप गए। उन्होंने उनके डर से अपने क्षत्रियोचित कर्मो का भी त्याग कर दिया। बहुत दिनों तक ब्राह्मणो का दर्शन न कर सकने के कारण वे धीरे-धीरे अपने कर्म भूलकर शूद्र हो गए। इस प्रकार द्रविड़,आमिर,पुण्ड्र और शबरों के सहवास में रहकर वे क्षत्रिय होते हुए भी धर्म-त्याग के कारण शूद्र की अवस्था में पहुँच गए। तत्पश्चात क्षत्रिय वीरों के मारे जाने पर ब्राह्मणो ने उनकी स्त्रियों से नियोग की विधि के अनुसार पुत्र उत्पन्न किये,किन्तु उन्हें भी बड़े होने पर परशुराम जी ने फरसे से काट डाला।

इस प्रकार एक-एक करके जब इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार हो गया तब आसमान में देेवतागण प्रकट हुए और परशुराम जी से बोले वत्स परशुराम इस हत्या के काम से निवृत हो जाओ। परशुराम भला बारम्बार इन बेचारे क्षत्रियों के प्राण लेने में तुम्हे कौन सा लाभ दिखाई देता है। फिर पितरों ने उन्हें समझाते हुए कहा महाभाग यह काम छोड़ दो,क्षत्रियों को न मारो। तब परशुराम जी ने कहा हे पुण्यात्माओं इन्होने छलपूर्वक मेरे महात्मा पिता की हत्या की है इन्हे मैं कैसे छोड़ सकता हूँ,कृपया आप सभी अपने अपने धाम को लौट जाएँ और मुझे अपना काम करने दें। तब पितर बोले-हे वत्स तुम तो विजय पानेवालों में श्रेष्ठ हो, बेचारे इन क्षत्रियों को मारना ना तो तुम्हे शोभा देता है और ना ही यह तुम्हारे योग्य है क्यूंकि तुम ब्राह्मण हो,अतः तुम्हारे हाथ से राजाओं का वध होना उचित नहीं है। 

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इसलिए हम सब की बात मान लो और इन क्षत्रियों का वध करना बंद करो। इस तरह देवताओं और पितरों के बार बार समझाने पर जब परशुराम जी का क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने उन सभी को भरोसा दिलाया की आज के बाद से वह क्षत्रियों पर कभी भी शास्त्र नहीं उठाएंगे। यह सुन देवताओं और पितरों ने उनपर पुष्पों की वर्षा की और फिर अपने धाम को लौट गए।