जगन्नाथ पूरी

पौराणिक काल से ही धर्म के नाम पर औरतों का शोषण होता आया है और ना जाने आज भी कितने बाबा, स्वामी और धर्मगुरु धर्म के नाम पर कितने ही स्त्रियों का शोषण कर रहे हैं। मीडिया में रोज ही इनके काले कारनामे उजागर होते रहते हैं। भगवान जैसे निर्जीव चीज की सेवा करने के नाम पर पुजारियों और मठाधिशों ने हमेशा से ही खुद को आम जनमानस से श्रेष्ठ ही समझा है। इन्ही धर्म के ठेकेदारों की सेवा के लिए ही देवदासी नाम की प्रथा शुरू की गई थी। अगर आपने देवदासी नाम की प्रथा के बारे में नहीं सुना है तो आपको बता दें की भारत में सबसे पहले धर्म के नाम पर देवदासी प्रथा के अंतर्गत औरतों के यौन शोषण को एक संस्थागत रूप दिया गया। इस पोस्ट में हम मिलकर जानेंगे कौन थी ये देवदासियां और नग्न होकर क्यों नाचती थी ये भगवान जगन्नाथ के मंदिर में।

देवदासियां रखने की प्रथा

इतिहास और मानव विज्ञान के जानकारों के अनुसार मंदिर में देवदासियां रखने की प्रथा संभवत: छठी सदी में शुरू हुई थी। देवदासी का मतलब है ‘सर्वेंट ऑफ गॉड’, यानी देव की दासी या पत्नी होता है। देवदासी हिन्दू धर्म में ऐसी स्त्रियों को कहते हैं, जिनका विवाह मन्दिर या अन्य किसी धार्मिक प्रतिष्ठान से कर दिया जाता है। देवदासियां मंदिरों की देख-रेख, पूजा-पाठ के लिए सामग्री-संयोजन, मंदिरों में नृत्य आदि के अलावा प्रमुख पुजारी, सहायक पुजारियों, प्रभावशाली अधिकारियों, सामंतों एवं कुलीन अभ्यागतों के साथ संभोग करती थीं, पर उनका दर्जा वेश्याओं वाला नहीं था। कालिदास के ‘मेघदूतम्‘ में मंदिरों में नृत्य करने वाली आजीवन कुंआरी कन्याओं का वर्णन मिलता है, जो संभवत: देवदासियां ही रही होंगी।

क्यों मंदिरों में चढ़ाई जाती है बलि ? – जानने के लिए यहां क्लिक करें।

देवदासी प्रथा को समाप्त करने की कोशिश

दक्षिण भारत के कई मंदिरों में ख़ास अनुष्ठानो के तहत ये देवदासियां पूर्ण रूप से नग्न होकर भगवान के सामने नाचती थी। ये भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाता था। भगवान जगन्नाथ पूरी के मंदिर में भी कुछ वर्ष पहले तक ऐसी कार्यक्रम नित्य किये जाते थे। समाज में देवदासियों को उच्च स्थान प्राप्त होता और उनका काम मंदिरों की देखभाल तथा नृत्य -संगीत सीखना होता है। परंपरागत रूप से वे ब्रह्मचारी होती थी लेकिन समय के साथ साथ पुजारियों और ओहदेदारों ने उनपर संभोग का अधिकार बना लिया। यह एक अनुचित और गलत सामाजिक प्रथा है। इसका प्रचलन दक्षिण भारत में प्रधान रूप से था। बीसवीं सदी में देवदासियों की स्थिति में कुछ परिवर्तन आया। पेरियार तथा अन्य नेताओं ने देवदासी प्रथा को समाप्त करने की कोशिश की।

यह भी पढ़ें – श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग उज्जैन भगवान शिव का तीसरा ज्योतिर्लिंग

आंध्रप्रदेश द्वारा इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित

ऐसी बात नहीं है कि अब यह कुप्रथा पूरी तरह समाप्त हो गई है। दक्षिण भारतीय मंदिरों में किसी न किसी रूप में आज भी उनका अस्तित्व है। स्वतंत्रता के बाद पैंतीस वर्ष की अवधि में ही लगभग डेढ़ लाख कन्याएं देवी-देवताओं को समर्पित की गईं। अभी भी यह कई रूपों में जारी है।कर्नाटक सरकार ने 1982 में और आंध्र प्रदेश सरकार ने 1988 में इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था, लेकिन मंदिरों में देवदासियों का गुजारा बहुत पहले से ही मुश्किल हो गया था। आज भी कहीं वैसवी, कहीं जोगिनी, कहीं माथमा तो कहीं वेदिनी नाम से देवदासी प्रथा देश के कई हिस्सों में कायम है। कर्नाटक के 10 और आंध्र प्रदेश के 14 जिलों में यह प्रथा अब भी बदस्तूर जारी है। सदियों से चली आ रही परम्परा का अब ख़तम होना बहुत ही जरुरी है। देवदासी प्रथा हमारे इतिहास का और संस्कृति का एक पुराना और काला अध्याय है, जिसका आज के समय में कोई औचित्य नहीं है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here