Bhagavad Gita (भागवदगीता)

दर्शकों जन्म से लेकर मृत्यु तक हम सभी जीवन पर्यन्त कर्म करते हैं,किसी ना किसी से मित्रता भी अवश्य करते हैं परन्तु क्या हम ये सोचते हैं की हम जो कर्म कर रहे हैं उसका परिणाम क्या होगा या जब किसी से मित्रता करते हैं तो उससे पहले क्या ये विचार करते हैं की हमें किस व्यक्ति से मित्रता करनी चाहिए और किस व्यक्ति से नहीं अगर आप ये नहीं सोचते तो इस वीडियो को पूरा देखें क्यूंकि इस वीडियो में हम आपको  भगवान श्री कृष्ण द्वारा गीता में कही गयी कुछ ऐसी ही बाते बताने जा रहा हूँ जिससे जानने के बाद ना तो आप कभी बुरे कर्म करने के बारे में सोच पाएंगे और नाही किसी बुरे इंसान को अपना मित्र बनाएंगे। मित्रो ये दश बिंदु ऐसे है जो ये दर्शाते है की आखिर विभाजन क्यों जरुरी है ।

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1) भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं की कर्म,मनुष्य का एक अभिन्न भाग है। कर्म सभी करते हैं,परन्तु क्या कोई भी मनुष्य कर्म करने से पूर्व एक बार ये विचार करता है या क्या वह सोचता हैं की हमारे प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया अवश्य होगी। या उसके द्वारा किया गया कर्म ,किसी और फल को जन्म देगी।जैसे की जब हम किसी झूले को झुलाते हैं तो वह लौटकर अपने पहले स्थान पर अवश्य आता है।  उसी प्रकार हमारे कर्म और उसके फल लौटकर आते हैं। कर्म का स्मरण करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं की आम का फल पकने के बाद बहुत मीठा होता है परन्तु क्या किसी आम के वृक्ष को बोने वाले  ने कदाचित इसके फल खाने की इच्छा नहीं की होगी। यदि की हो भी तो यह आवश्यक नहीं की उसने इसके फल खाये भी हो,परन्तु आप और हम अवश्य खाते हैं। अगर वर्षों पहले किसी ने इस आम के पेड़ के बदले बबूल बोया होता तो कदाचित उसके कांटे आज हमारे पांव में चुभते। ठीक इसी तरह  कभी-कभी हमारी पिछली पीढ़ी के कर्मो का फल हम भोगते हैं और हमारे कर्मो का फल हमारी आने वाली पीढ़ी भोगती है। कर्म करते समय फल की चिंता करना ना करना ये प्रत्येक व्यक्ति विशेष का अधिकार है। परन्तु वो फल बो रहा है या कांटे उस पर विचार कर लेना उसका कर्तव्य है। चुकी मीठा फल मिलेगा या काँटों का दंश सहना पड़ेगा ये तो आज आपके बोये पर निर्भर करता है। नियति केवल ये निर्धारण करती है की उसे आप भोगेंगे या आपका भविष्य।

2) इसके अलावा श्री कृष्ण गीता में आगे कहते हैं की मनुष्य के जीवन में कभी ना कभी किसी ना किसी प्रकार की दुविधा अवश्य आती है और प्रत्येक दुविधा से एक नए विकल्प का जन्म होता है।  ऐसे में सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है मनुष्य कौन से विकल्प का चयन करता है क्यूंकि हमारे चयन पर ही हमारा भविष्य निर्भर करता है। जैसे की हम कैसा भोजन चुनते हैं उससे हमारा शरीर निर्धारित होता है। हम कैसे वस्त्र चुनते हैं उससे हमारा व्यक्तित्व प्रदर्शित होता है। हम कैसे वाहन पर चढ़ते हैं उससे हमारे यात्रा की सुगमता निर्धारित होता है। परन्तु क्या हमारे चयन का महत्त्व केवल इतना ही है,क्या हमारा चयन सबसे अधिक महत्वपूर्ण तब नहीं हो जाता जब परिस्थितियां कठिन हो। बोलने से पूर्व शब्दों का चयन कर लेना वरदान सिद्ध हो सकता है और श्राप भी। विवाद के समय युद्ध किया जाये या शांति का प्रयास ये चयन भविष्य बदल सकता है। नियति हमें द्वन्द में फंसाती है,भाग्य हमें विकल्प देता है। परन्तु भविष्य चयन पर निर्भर है। अब प्रश्न ये उठता है की चयन कैसे किया जाए चूँकि मन तो चंचल है परन्तु इस प्रश्न का उत्तर भी हमारा मन ही देता है। जो चयन उत्साह दे संतोष नहीं,जो विजय का आनंद दे,मन की शांति नहीं क्या वह उचित है। हाँ या ना। ये चयन भविष्य बदल सकता है।

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3) गीता में भगवान् कृष्ण कहते हैं की हर मनुष्य ये सोचता है की समय ही सर्वशक्तिशाली है परन्तु वह यह भूल जाता है की सत्य उससे भी बलवान है। हर मनुष्य  कभी ना कभी कहीं ना कहीं किसी ना किसी भय से सत्य को छुपाने का प्रयास अवश्य करता है और यही कहीं ना कही सबसे बड़ा अधर्म हो जाता है। जिस प्रकार ज्वालामुखी अंततः भूमि का बंधन तोड़कर बाहर आ जाता है उसी प्रकार सत्य भी एक दिन सामने आही जाता है। चूँकि नियति सत्य को समक्ष लाने का मार्ग ढूंढ ही लेती है। सत्य उस सूरज की भांति है जिसे असत्य के घने मेघ ढक नहीं सकते। नियति नामक वायु असत्य के घने मेघ को हटाके सत्य की सूरज को प्रकाशित कर ही देती है। असत्यरूपी अधर्म पर सत्य रुपी धर्म की विजय निश्चित है। इसलिए हर मनुष्य को चाहिए की वह बिना किसी भय के अपने सत्य प्रकट करे ना की उसे छुपाने का प्रयत्न।

4) भगवान कृष्ण ने ये बात हस्तिनापुर की राजयसभा में उस समय कही थी जब भीष्म ने हस्तिनापुर के विभाजन का प्रस्ताव हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र के समक्ष रखा था और सभा में उपस्थित अधिकतर सभासद विभाजन के पक्ष में नहीं थे। तब श्रीकृष्ण ने उन सभी से कहा था की विभाजन या बंटवारा जिसे आप सभी एक नकारात्मक स्वरुप में देखते हैं परन्तु क्या ये सत्य नहीं है की बंटवारा तो हर स्थान पर होता है जैसे एक स्त्री अपने प्रेम का बंटवारा करती है अपने पति और संतान के बिच। परन्तु ये नाकारात्मक नहीं। मन जुड़ जाए तब भी हम अपनी वस्तुएं,अपनी सम्पति अपनी प्रसन्नता बांटते हैं। और मन बिखर जाए तब भी। अंतर है सोच का। प्रेम में बंटवारा सहयोग कहलाता है और शत्रुता में इसे नाम देते हैं विभाजन का। प्रेम में बांटना अस्तित्व को एक करना है और शत्रुता में विभाजन का अर्थ है सीमाएं खींचना। परन्तु जिस प्रकार कभी-कभी महान शांति के लिए युद्ध आवश्यक है उसी प्रकार कभी कभी संतोष से जीने के लिए विभाजन भी आवश्यक है। जैसे अगर किसी मिटटी के पात्र में दरार आ जाती है तो क्या ये अच्छा नहीं होगा की उसे पकने से पूर्व ही किसी और पात्र में ढाल दिया जाए। अन्यथा यदि ये पक गया तो किसी काम का नहीं रहेगा। वैसे विभाजन तो तभी हो जाता है जब मन से एक दूसरे के लिए आदर समाप्त हो जाए। यद्यपि विभाजन एक विध्वंस है परन्तु नवनिर्माण के लिए कभी-कभी इसकी आवश्यकता होती है। इसलिए पितामह के विभाजन के प्रस्ताव में मुझे तो कोई भी त्रुटि नजर नहीं आता बल्कि हस्तिनापुर के विभाजन से तो मुझे शांति का मार्ग प्रशस्त होते हुए दिख रहा है।

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5) श्री कृष्ण आगे कहते हैं की हर मनुष्य कभी न कभी  कुछ पाने की कामना अवश्य करता है और अपने बालक को गोद में अटखेलियां करवाता  है। और इन सब भाव का एक ही आधार है और वह है मोह। कुछ लोग कहते हैं की मोह बंधन है,मोह अवगुण है परन्तु नहीं,कोई भी भाव कभी गुण बन सकता है कभी अवगुण। तो अब यहाँ ये सवाल उठता है की क्या मोह गुण हो सकता है,हाँ यदि वह सीमा में रहे। परिवार से मोह सीमा में रहे तो वह ममत्व को जन्म देता है। यदि वह सीमा से अधिक हो जाए तो वैराग्य को। कारण यह है की आवश्यकता से अधिक मोह मनुष्य को दुर्बल बना देता है। और दुर्बलता नाश की ओर ले जाती है। इसलिए यह समझना आवश्यक हो जाता है की कहाँ रुकना है,सीमा क्या है ? चूँकि जो ना रुका उसे विनाश के गर्त में जाना निश्चित है।

6) हर मनुष्य को किसी ना किसी चीज से भय अवश्य लगता है फिर चाहे वह भय धनहानि का हो या मानहानि का। मनुष्य सदा भय को बुरा समझता हैं,हर वक़्त भय उसे हानि होने का सताता रहता है परन्तु वह कभी ये नहीं सोचता की भय लाभदायक भी हो सकता है। सोचिये किसी अनुचित कार्य के परिणाम का भय क्या आपको वो करने  से रोक नहीं लेता,रोकता है परन्तु अनुचित कार्य हो जाने के पश्चात उसे संसार के समक्ष ना लाने का भय हमें एक के पश्चात दूसरी भूल करने पर विवश करता है।भले ही हम कोई ना कोई प्रयास करके हम अपना सम्मान बचा अवश्य लेते हैं परन्तु भविष्य में इसके परिणाम भयंकर सिद्ध हो सकते हैं। इसीलिए कोई भी कार्य करने से पूर्व उसके परिणाम को जानना जितना आवश्यक होता है उतना ही आवश्यक होता है कोई भूल हो जाने के पश्चात् उसे तुरंत स्वीकार कर लेना।

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7) आप जिससे प्रेम करते हैं सदा उनके समीप रहना चाहते हैं। नहीं चाहते की कभी अपनों से दूर होना पड़े,बिछड़ना पड़े,परन्तु एक समय के पश्चात अपनों से दूर हो जाना उन्नति के लिए आवश्यक है। आप माता-पिता हैं ना यदि आप अपने संतान के जीवन के पग-पग पर उनका मार्गदर्शन करते रहेंगे तो आपकी संतान स्वंय मार्ग चुनना कैसे सीखेगी,मार्ग के काँटों से स्वंय को बचना कैसे सीखेगी ? इसीलिए एक समय के पश्चात् अपनों से बनाई गई दूरी सदा लाभदायक रहती है। इसलिए यह आवश्यक है की मनुष्यों को चाहिए की वह एक निश्चित समय के बाद अपने संतान को अपने मार्गों का चयन करने के लिए अकेला ही छोड़ दें और आवश्यकता पड़ने पर उसे अपने से दूर कर दें ताकि आपके जाने के पश्चात् वह जीवन में आने वाली सभी बाधाओं का सामना आसानी से कर सके।

8) गीता में श्री कृष्ण आगे कहते हैं की जिस प्रकार सूर्योदय से ठीक पूर्व रात्रि तनिक अधिक गहरी और गाढ़ी हो जाती है,उसी प्रकार एक नए प्रारम्भ से पूर्व मन पर,सोच पर,विचारों पर अन्धकार छा जाता है। मानव मन जो ठहरा दुविधा आ ही जाती है। क्या आगे जो होगा वह शुभ होगा। क्या जीवन में जो हम पीछे छोड़ आये हैं वो कहीं भूल तो नहीं,ऐसे में क्या करना चाहिए। जिसका जवाब देते हुए श्री कहते हैं की इस समस्या का केवल एक ही उपाय है आगे  बढ़ें,चूँकि आगे बढ़ने के लिए हमें अपने पांव से उस धरा को धकेलना पड़ता है जिस पर हम खड़े हैं। जहाँ मार्ग ना हो वहाँ लक्ष्य नहीं भूलना चाहिए। बस एक नया मार्ग बनाने का परिश्रम करना चाहिए। चूँकि नया मार्ग बनाया तो लक्ष्य मिलेगा ही। और यदि लक्ष्य नवनिर्माण का हुआ तो मार्ग भी बनेगा।परन्तु जो मनुष्य आगे बढ़ने के बदले दुविधा में फंसा रह जाता है उसका जीवन सदा के लिए अमावस्या के रात्रि जैसी अंधकारमय हो जाती है।

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9) इतना ही नहीं श्री कृष्ण गीता में आगे कहते हैं की शांति किसे नहीं चाहिए मानव युद्ध भी शांति के लिए ही करता है और संधि भी। आप में से कुछ कहेंगे की आगे बढ़ने के लिए सदा संघर्ष ठीक नहीं होता संधि का मार्ग ठीक है क्यूंकि शक्तिशाली को परास्त करने के लिए हमारी भी शक्ति का क्षय होता है। वो शक्ति जिसे हम विकास में लगा सकते हैं। परन्तु शक्तिशाली से मित्रता करने से पूर्व क्या ये जानलेना उचित नहीं की शक्तिशाली का मंतव्य क्या है ? कहीं हम संघर्ष बचाकर एक बड़े उत्पात को तो जन्म नहीं दे रहे हैं। चूँकि सर्प से मित्रता आपको शांति नहीं देती। अपितु सर्प को अवसर देती है की भविष्य में वो आपको डस सके।

10) साथ ही श्री कृष्ण गणित के बारे बताते हुए कहते हैं की  गणित भी कैसा महान विषय है  ऋण और ऋण मिल जाए तो धन बन जाते हैं परन्तु अंकगणित और जीवन के गणित में बड़ा अंतर है। बुरे से बुरा मिल जाए तो कभी अच्छा सिद्ध नहीं होता। यदि दो बुरे संधि कर लें तो वह अधिक भयंकर सिद्ध होते हैं। ऐसे में उनकी मित्रता उनकी संधि का विच्छेद आवश्यक है चाहे वो किसी भी भाँती हो। यदि खूंटा धरती में फंस जाए तो सदा खूंटे पर प्रहार नहीं करते कभी-कभी धरती को भी खोदना पड़ता है। इसीलिए श्रेष्ठ यही है की संधि कराए से पूर्व विचार कर लेना चाहिए। यदि परिणाम भयंकर दिखे तो उससे उसका विच्छेद कर दिया जाए।

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तो दर्शको गीता मैं  भगवान कृष्ण द्वारा मनुष्य के जीवन से जुडी बहुत ही छोटी से छोटी चीजों के बारे में बताया गया है जिसका अगर पालन किया जाए तो कोई भी मनुष्य ना तो कभी बुरा कर्म कर सकता है और नाही नकारात्मक विचारों को खुद पर हावी होने दे सकता है। इतना ही नहीं मेरे विचार से तो गीता के अध्ययन से तो एक ऐसे समाज का निर्माण किया जा सकता है जिसकी हम आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

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