रामायण में ऐसी कई कहानियां मिलती है जिसके बारे में शायद बहुत कम लोग जानते हैं। हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ रामायण को मुख्यतया राम जन्म, राम-सीता विवाह, राम का वनवास, सीता अपहरण और राम-रावण युद्ध के वर्णन के रूप में जाना जाता है,लेकिन ऐसा नहीं है।रामायण में मुख्य कथा के आलावा भी कई ऐसी घटनाओं का वर्णन किया गया है जिसके बारे में हम आप नहीं जानते हैं।

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एक ऐसी ही अनसुनी कहानी है माँ सीता और लक्षण के सम्बन्ध में। रामायण में इस बात का वर्णन मिलता है की देवी सीता ने अपने पुत्र समान देवर को जिन्दा ही निगल लिया था। तो आइये जानते है की आखिर देवी सीता ने पुत्र समान लक्षण को क्यों निगल लिया था।

हम सभी जानते हैं की माता सीता अपने देवर लक्ष्मण को पुत्र की भांति चाहती थी। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि माता सीता ने अपने पुत्र समान देवर लक्ष्मण को जिन्दा ही निगल लिया था।

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कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीराम रावण का वध करने के बाद अयोध्या वापस आए तो अयोध्या को खूब सजाया गया और श्रीराम के आने की ख़ुशी में उत्सव का आयोजन किया गया। सभी अयोध्यावासी उत्सव मानाने में व्यस्त थे की अचानक माता सीता को याद आया कि वन जाते समय उन्होंने मां सरयु नदी से वादा किया था कि अगर वे अपने पति श्रीराम और देवर लक्ष्मण के साथ वनवास काटकर सकुशल अयोध्या लौटेंगी तो सरयु तट पर पूजा-अर्चना करेंगी। वे अपने इस वादे को पूरा करने के लिए रात्रि में ही देवर लक्षमण के साथ नदी के तट की ओर चली गईं।

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सरयू तट पहुँचते ही पूजा करने के लिए माता सीता ने लक्ष्मण को नदी का जल लाने को कहा। लक्षमण जल लेने के लिए घड़ा लेकर सरयू नदी में उतर गए। लक्ष्मण जल भर ही रहे थे की तभी सरयू के जल से एक अघासुर नामका राक्षस निकला जो लक्ष्मण को निगलना चाहता था। लेकिन माता सीता यह देख घबरा गई और लक्षमण को बचाने के लिए अघासुर से पहले खुद लक्ष्मण को निगल गई। लक्ष्मण को निगलते ही देवी सीता का शरीर पानी की तरह पिघलने लगा।

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यह सारी घटना राम भक्त हनुमान अदृश्य रूप से देख रहे थे। माता सीता को जल की तरह गलता देख हनुमान ने सीता के तन की जलिये अवस्था को एक घड़ा में जमाकर भगवान श्री राम के पास लेकर आये और सारे घटना का विवरण श्रीराम को सुनाया। हनुमान की बात सुनकर श्री राम मुस्कुराये और कहा हे पवनसुत सारे राक्षसों का वध तो मैंने कर दिया लेकिन ये राक्षस मेरे हाथों से मरने वाला नहीं है। इसे भगवान शिव का वरदान प्राप्त है की जब त्रेतायुग में देवी सीता और लक्षमण का शरीर एक तत्व में बदल जायेगा तब उसी तत्व के द्वारा इस राक्षस का अंत होगा और वह तत्व रुद्रावतारी हनुमान के द्वारा अस्त्र रूप में प्रयुक्त किया जायेगा। इसलिए हे हनुमान इस तत्व को तत्काल सरयू नदि के जल में प्रवाहित कर आओ।

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इस तत्व के जल में प्रवाहित होते ही अघासुर का अंत हो जायेगा और सीता लक्ष्मण पुनः अपने रूप में आ जायेंगे। श्रीराम की आज्ञा पाते ही हनुमान घड़ा लेकर सरयू नदी के तट पर पहुंचे और घड़ा को श्रीराम का नाम लेकर सरयू के जल मे प्रवाहित कर दिया। प्रवाहित करते ही सरयू नदी मे आग की लपटें उठने लगी। और इसी आग में जलकर अघासुर का अंत हो गया। अघासुर का अंत होते ही माता सीता और लक्षमण पुनः अपने वास्तविक रूप में आ गए।

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